बढ़ती हुई जलवायु परिवर्तन चिंता का समाधान केवल नीति के माध्यम से शायद पर्याप्त नहीं है। इस लेख में, दुबाश और श्रीधर कहते हैं कि जलवायु-संबंधित कानून से अर्थव्यवस्था के व्यापक परिणामों को सुनिश्चित किया जा सकता है, और जलवायु कानून को लागू करने की उम्मीद करने वाले देशों के समक्ष ऐसे नौ विचार प्रस्तुत करते हैं जिनको जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए अपनाया जाना चाहिए। वे व्यापक राजनीतिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए, यह सुनिश्चित करते हुए कि पर्यावरण और विकास दोनों उद्देश्यों को पूरा किया जा सके; इन कानूनों को डिजाइन करने के संभावित तरीकों पर चर्चा करते हैं।
भारत में जलवायु नीति के बारे में अवधारणा बढ़ी है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के विचार भारतीय कानून में शायद ही परिलक्षित होते हैं। फिर भी जलवायु चुनौती के पैमाने और व्यापक दायरे से पता चलता है कि, समय के साथ, केवल नीति प्रक्रिया के माध्यम से जलवायु संबंधी चिंताओं का समाधान करना पर्याप्त नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन के चलते नए समन्वय और सूचना संस्थानों के निर्माण, या कार्बन बाजार जैसे व्यापक तंत्र के निर्माण की आवश्यकता हो सकती है। इसके अतिरिक्त, अर्थव्यवस्था-व्यापी निम्न-कार्बन और जलवायु अनुकूल भावी सौदे (फ्यूचर्स) सुनिश्चित करने हेतु, क्षेत्रीय निर्णय लेने के माध्यम से जलवायु परिवर्तन की मुख्यधारा की आवश्यकता होगी। हालांकि, जलवायु-संबंधी नियमन को कानून में शामिल करना एक जटिल प्रयास है। क्या यह नए कानून के माध्यम से होना चाहिए? क्या इसे मौजूदा कानून में क्रमिक संशोधन के माध्यम से आगे बढाया जाना चाहिए? क्या इसका ध्यान प्रयोग को सक्षम करने पर होना चाहिए, या नए निर्देशों के साथ नियामक अनुपालन की बाध्यता रखनी चाहिए?
जलवायु नियमन कार्य
ऊर्जा संरक्षण अधिनियम (लोकसभा में पारित) के हालिया संशोधन में, कार्बन व्यापार योजना हेतु कानूनी आधार पेश करके मौजूदा कानून में संशोधन के माध्यम से जलवायु परिवर्तन को आंतरिक बनाया गया है। इससे पुरानी प्रथा (पद्धति) समाप्त हो जाती है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैस शमन से संबंधित अधिकांश भारतीय कानूनों में ऊर्जा आपूर्ति और इसके उपयोग पर ध्यान देते हुए अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया है- जबकि ईसीए संशोधन बिल में सीधे कार्बन को विनियमित करने का प्रयास किया गया है।
जलवायु कानून के लिए क्या यह “अव्यवस्थित उन्नयन' दृष्टिकोण उचित है? या अधिक व्यवस्थित दृष्टिकोण की आवश्यकता है? लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स तथा क्लाइमेट लीगल, साउथ अफ्रीका के अपने सहयोगियों के सहयोग से सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च द्वारा हाल ही में तैयार किए गए एक संक्षिप्त विवरण (श्रीधर एवं अन्य) में, हम इस सवाल की जांच करते हैं कि जलवायु संबंधी कानून किस प्रकार से प्रस्तुत किया जाए। हमारा सुझाव है कि देशों को अच्छी तरह से यह पूछकर कि कोई भी सुझाए गए कानून या कानूनी संशोधन किस समस्या को हल करने की कोशिश कर रहे हैं, इन्हें अपनाने की सलाह दी जाएगी।
इसे अलग तरीके से कहें तो, जलवायु परिवर्तन के कारण इसके नियमन के कार्य-तरीकों का एक विशिष्ट सेट सामने आता है, जिसे जलवायु परिवर्तन से प्रभावी ढंग से निपटने की उम्मीद करने वाले किसी भी देश को अपने नियमन तंत्रों के माध्यम से अपनाया जाना चाहिए। य़े हैं:
i) कथनात्मक और उच्च-स्तरीय दिशा-निर्धारण- राजनीतिक ध्यान केंद्रित करने और अपेक्षाओं को निर्धारित करने के लिए
ii) जानकारी और विशेषज्ञ सलाह - खतरों और समाधानों की लगातार विकसित हो रही समझ के साथ जलवायु नियमन संबंधी कार्रवाई को अद्यतन रखने हेतु
iii) रणनीतिक अभिव्यक्ति - बड़े पैमाने पर जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में लघु और दीर्घकालिक रणनीतियों को लागू करने के लिए
iv) एकीकरण - मौजूदा कानूनों और नीतियों के उन्नयन के लिए, ताकि जलवायु उद्देश्यों के सुसंगत सक्षमता को सुनिश्चित किया जा सके
v) मुख्यधारा में लाना - कृषि और निर्माण जैसे अन्य क्षेत्रों में प्रक्रियाओं को स्थापित करने के लिए, ताकि हरित क्षेत्र को अपनाने हेतु उनकी क्षमता एवं रूचि को बढाया जा सके
vi) समन्वय- जलवायु के बारे में सभी प्रकार के सरकारी सहयोग स्थापित करने के लिए: केंद्र और राज्यों के बीच, राज्यों के बीच और मंत्रालयों के बीच
vii) हितधारकों से जुड़ाव और तालमेल बिठाना - जलवायु संबंधी नीतियों और कार्यों के संदर्भ में आम सहमति और विश्वसनीयता बनाने के लिए
viii) वित्त जुटाना और चैनलिंग - जलवायु महत्वाकांक्षा के लिए पर्याप्त धन (निजी, सार्वजनिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय) जुटाने के लिए
ix) पर्यवेक्षण, जवाबदेही और प्रवर्तन- योजनाओं के सख्त कार्यान्वयन को सुनिश्चित करने हेतु निगरानी और दंड की एक मजबूत व्यवस्था स्थापित करने के लिए।
जैसा कि इस सूची से पता चलता है, जलवायु परिवर्तन के लिए पूरी तरह से विकसित प्रतिक्रिया से जुड़े नियमन कार्य काफी महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि ये सब एक ही बार में होना चाहिए; बल्कि, उन्हें उचित रूप से एक अनुक्रम में किया जा सकता है। हल की जाने वाली समस्याओं का पता लगाते हुए नियमन कार्य के दृष्टिकोण से शुरुआत करने से, जलवायु कानून हेतु ‘सभी के लिए एक ही तरह’ के समग्र दृष्टिकोण की मांग करने के बजाय- इन नियमन कार्यों को निर्धारित करने के लिए देश-विशिष्ट दृष्टिकोणों के साथ, राष्ट्रीय संदर्भों में अलग-अलग रूप में कानूनी सुधार किये जा सकते हैं।
जलवायु-संबंधी नियमन के संभावित दृष्टिकोण
भविष्य के लिए कई उपाय संभव हैं: प्रत्येक के अपने उतार-चढ़ाव के साथ। सबसे पहला, सभी कार्यों को कानून के दायरे में करने की आवश्यकता नहीं है। भारत जैसे देश कार्यकारी प्रक्रियाओं- जैसे कि भारत की जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (2008 में स्थापित), और इसके बाद के मिशन के माध्यम से इनमें से कुछ उद्देश्यों को पूरा करने का विकल्प चुन सकते हैं।
यह आरंभ करने का एक उपयोगी और कम लेन-देन लागत वाला तरीका हो सकता है, जबकि इससे नीतिगत कार्रवाइयां भी सीमित हो सकती हैं। एक लोकतांत्रिक राजनीति में कानून, कार्यकारी कार्यों और नीतियों के विपरीत- राजनीतिक सहमति की सबसे औपचारिक अभिव्यक्ति के रूप में हैं। ये कानून लोगों की जवाबदेही बढ़ा सकते हैं, सरकारी कार्रवाई को सशक्त बना सकते हैं, इनके उल्लंघन (बैकस्लाइडिंग) को रोक सकते हैं, और परिणामों की स्वीकार्यता बढ़ा सकते हैं – और जलवायु परिवर्तन की दीर्घकालिक, परिवर्तनकारी मांगों के लिए लाभकारी साबित हो सकते हैं।
इसलिए, एक दूसरा विकल्प कार्बन बाजारों के लिए एक आधार के रूप में स्थापित ईसीए में किये गए संशोधन के अनुरूप, भारत में मौजूदा कानूनों में विषयानुसार आधार पर 'जलवायु उन्नयन' को जारी रखा जाना है। उदाहरण के लिए, ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) को प्रदूषकों के रूप में वर्गीकृत करने के लिए वायु और जल अधिनियमों में संशोधन किया जा सकता है, और ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) के उत्सर्जन की निगरानी का कार्य राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को सौंपा जा सकता है।
फिर भी, ‘अव्यवस्थित उन्नयन’ दृष्टिकोण को अपनाने से उसमें डिजाइन जोखिम भी आता है, जिसमें भारत के जलवायु-संबंधी कानून की शुरुआत एक बड़ी सोच से हो सकती है लेकिन वह एक अनसुलझी पहेली के रूप में (बेहद छोटे तरीके के साथ) समाप्त हो सकती है। यदि कानून और इनके तहत आने वाले जलवायु नियमन तंत्र को अवसरवादी ढंग से संशोधित किया जाता है, तो इसके अंतर्गत विभिन्न परिवर्तन एक साथ कुशलतापूर्वक लागू नहीं हो सकेंगे, और संभवतः इनमें से कुछ एक दूसरे के खिलाफ भी हो सकते हैं। इस तरह के दृष्टिकोण हेतु बहुत अधिक संशोधनों की भी आवश्यकता हो सकती है, जिसके लिए असंभावित प्रयास और अनुपयोगी समय की आवश्यकता होगी।
तीसरा दृष्टिकोण, निश्चित रूप से, एक सर्वव्यापी जलवायु-संबंधी कानून है। एकात्मक कानून हो सकते हैं, और कई मामलों में वे संदर्भ के अनुरूप भी बनाए गए हैं। इस तरह के कानून आम तौर पर एक ठोस कथनात्मक-मार्गदर्शक कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं। उल्लेखनीय है कि, कई मौजूदा कानूनों में समयबद्ध शमन पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जबकि अन्य में हरित विकास या विकास और शमन को एक साथ लाने और कुछ अन्य में अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित किया गया है। फ्रेमवर्क कानूनों में अलग-अलग कानूनों और नीतियों को एकीकृत करने के तंत्र भी होते हैं, जो एक ‘अव्यवस्थित उन्नयन’ पर पहले के प्रयासों के सामंजस्य हेतु एक मार्ग प्रदान करते हैं। उनमें विशेष जलवायु निकायों की स्थापना के प्रावधान भी होते हैं जो ज्ञान प्रदान करने और समन्वय के कार्य कर सकते हैं। चूंकि ये निकाय मूलतः बहुआयामी होते हैं, इसलिए आमतौर पर इन्हें एक ही जलवायु कानून के जरिये स्थापित किया जाता है, जो किसी एक क्षेत्रीय कानून के विपरीत है।
साथ ही, किसी एकात्मक कानून को लागू करने हेतु कम से कम घरेलू स्तर पर जलवायु कार्रवाई हेतु एक ठोस कथन नहीं, अपितु बहुत बड़ी राजनीतिक सहमति की आवश्यकता होती है। जलवायु समस्या के विशाल स्वरूप को देखते हुए, इसके लिए नियमन की व्यापक अवधारणा के साथ कुशल एकीकरण की भी आवश्यकता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि जलवायु शमन और अनुकूलन के साथ-साथ अन्य विकास उद्देश्यों को पूरा किया जा सके। इस दिशा में एकात्मक कानून अंततः एक आवश्यक परिणाम हो सकता है, इसकी राह लंबी और जटिल हो सकती है।
इस प्रकार से, जलवायु-संबंधी नियमन, चरणबद्ध तरीके से, जलवायु कानून के प्रश्न को इसमें शामिल करने का एक उपयोगी तरीका प्रदान करता है। इससे जलवायु-संबंधी नियमन को स्थानीय संदर्भ में अनुकूलित करने, अन्य विकास उद्देश्यों को आंतरिक बनाने और भारत जैसी जटिल राजनीति के भीतर राजनीतिक सहमति के स्तरों के अनुरूप परिवर्तनों को अनुक्रमित किया जा सकता है।
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लेखक परिचय: नवरोज के दुबाश नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में प्रोफेसर हैं और ली कुआन यू स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी, एनयूएस में एडजंक्ट सीनियर रिसर्च फेलो हैं। अनिरुद्ध श्रीधर सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में एसोसिएट फेलो हैं|
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